Premanand Ji Maharaj: एक साधक ने प्रेमानंद जी से सवाल किया आध्यात्मिक जीवन में अक्सर यह प्रश्न उठता है कि क्या भगवान की प्राप्ति के लिए कठोर तपस्या, उपवास या अन्न-जल का त्याग आवश्यक है। इसी विषय पर पूज्य प्रेमानंद जी महाराज ने एक अत्यंत सरल, स्पष्ट और शास्त्रसम्मत मार्गदर्शन दिया है।
महाराज जी का उत्तर
पूज्य प्रेमानंद जी महाराज कहते हैं कि अन्न-जल का त्याग करने मात्र से भगवान की प्राप्ति नहीं होती।
यदि केवल भूखे-प्यासे रहने से ही ईश्वर मिल जाते, तो संसार का प्रत्येक व्यक्ति यह उपाय कर सकता था। लेकिन ईश्वर प्राप्ति इतनी सरल शारीरिक क्रिया से संभव नहीं है।
शरीर भगवान की अमानत है
महाराज जी समझाते हैं कि यह शरीर स्वयं भगवान की दी हुई अमानत है।
शरीर को कष्ट देना, भूखा रखना या असंतुलित करना भक्ति नहीं, बल्कि अज्ञान का परिणाम है।
भूख और प्यास से मन अशांत हो जाता है, चित्त स्थिर नहीं रहता और साधना में बाधा उत्पन्न होती है।
वास्तविक साधना क्या है?
पूज्य महाराज जी के अनुसार भगवान को पाने का मार्ग बाहरी त्याग नहीं, बल्कि आंतरिक शुद्धता है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि सच्ची भक्ति के लिए आवश्यक है—
- मन की पवित्रता
- अहंकार, क्रोध और लोभ का त्याग
- भगवान के नाम का निरंतर स्मरण
- सात्विक और संतुलित भोजन
- अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन
यही वह मार्ग है जिस पर चलकर भक्त भगवान के निकट पहुँचता है।
भगवान कहाँ वास करते हैं?
महाराज जी कहते हैं—
भगवान भूखे शरीर में नहीं, बल्कि शुद्ध हृदय में वास करते हैं।
अन्न और जल का त्याग नहीं, बल्कि बुरे विचारों, गलत आचरण और अहंकार का त्याग आवश्यक है।
निष्कर्ष
पूज्य प्रेमानंद जी महाराज का संदेश अत्यंत स्पष्ट है—
भगवान की प्राप्ति के लिए शरीर को कष्ट देना आवश्यक नहीं है।
सच्ची भक्ति सरल है, सहज है और प्रेम से भरी हुई है।
नाम-स्मरण, सदाचार और शुद्ध जीवन ही ईश्वर तक पहुँचने का वास्तविक मार्ग है।