Premanand Ji Maharaj: आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में तनाव और मानसिक अशांति एक आम समस्या बन चुकी है। काम का दबाव, सामाजिक प्रतिस्पर्धा और लगातार मोबाइल व सोशल मीडिया के उपयोग के कारण लोगों का मन अक्सर विचलित रहता है। ऐसे समय में वृंदावन के संत प्रेमानंद जी महाराज ने एक बहुत सरल लेकिन प्रभावी उपाय बताया है—कुछ समय के लिए मौन और एकांत का अभ्यास करना।
अपने प्रवचन में उन्होंने कहा कि इंसान का मन सबसे ज्यादा तब थकता है जब वह हर समय बोलता रहता है, दूसरों की बातों में उलझा रहता है और अनावश्यक चर्चाओं में समय बिताता है। लगातार बाहरी शोर और विचारों की भीड़ मन को अशांत कर देती है। लेकिन जब व्यक्ति कुछ समय के लिए मौन हो जाता है और अकेले बैठकर अपने विचारों को शांत करता है, तब उसे भीतर की शांति का अनुभव होने लगता है।
प्रेमानंद जी महाराज के अनुसार, मौन रहने का अर्थ केवल बोलना बंद करना नहीं है, बल्कि मन को भी शांत करना है। जब व्यक्ति नकारात्मक बातों, आलोचना और बेकार की चर्चाओं से दूर रहता है, तब उसका मन धीरे-धीरे स्थिर होने लगता है। इसी स्थिरता में व्यक्ति अपने जीवन के बारे में बेहतर सोच सकता है और सही निर्णय लेने की क्षमता विकसित करता है।
उन्होंने यह भी कहा कि एकांत का समय व्यक्ति को आत्मचिंतन का अवसर देता है। दिनभर की भागदौड़ में इंसान अक्सर खुद को ही समय नहीं दे पाता, लेकिन जब वह कुछ देर अकेला बैठता है, तो उसे अपनी गलतियों, अपनी अच्छाइयों और अपने लक्ष्य के बारे में सोचने का अवसर मिलता है। यही समय मानसिक शक्ति को बढ़ाता है और जीवन में संतुलन लाता है।
आध्यात्मिक दृष्टि से भी मौन और एकांत का विशेष महत्व बताया गया है। कई संत और महापुरुष इसे मन की शुद्धि और आत्मिक विकास का सबसे सरल मार्ग मानते हैं। उनका मानना है कि शांति बाहर नहीं, बल्कि हमारे भीतर ही होती है, बस उसे महसूस करने के लिए मन को शांत करना जरूरी है।
अंत में प्रेमानंद जी महाराज ने लोगों को संदेश दिया कि अगर जीवन में तनाव, चिंता या उलझन बढ़ जाए, तो कुछ समय के लिए मौन और एकांत का अभ्यास अवश्य करें। यह छोटा-सा प्रयास मन को हल्का करता है और जीवन को सकारात्मक दिशा देने में मदद करता है।