Premanad Ji Maharaj वृंदावन। प्रसिद्ध संत प्रेमानंद जी महाराज ने अपने प्रवचन में भगवान श्रीकृष्ण की प्राप्ति के सरल और प्रभावशाली मार्ग के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने कहा कि कलयुग में भगवान का नाम ही सबसे सुलभ और शक्तिशाली साधन है, जिसके माध्यम से कोई भी व्यक्ति प्रभु की कृपा प्राप्त कर सकता है। महाराज जी के अनुसार निरंतर नाम जप, पूर्ण शरणागति, निष्कपट आचरण और भगवान के प्रति अनन्य प्रेम ही सच्ची भक्ति का आधार हैं।
अपने प्रवचन में महाराज जी ने कहा कि जब मनुष्य का मन, बुद्धि और चित्त पूरी तरह भगवान में लग जाते हैं, तब उसे प्रभु की सहज प्राप्ति होने लगती है। उन्होंने कहा कि भक्ति का मार्ग कठिन नहीं है, बल्कि इसे सरल बनाने के लिए केवल सच्चे भाव और समर्पण की आवश्यकता होती है।
महाराज जी ने सबसे पहले निरंतर नाम जप के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि ‘राधा-राधा’ या ‘श्रीकृष्ण’ नाम का नियमित और श्रद्धा के साथ जप करने से मन शुद्ध होता है और चित्त स्थिर होता है। उनका कहना था कि भगवान के नाम में इतनी शक्ति है कि वह व्यक्ति के भीतर के विकारों को दूर कर देता है और उसे आध्यात्मिक शांति प्रदान करता है।
इसके साथ ही उन्होंने पूर्ण शरणागति को भक्ति का महत्वपूर्ण अंग बताया। उन्होंने कहा कि जब मनुष्य अपने अहंकार को त्याग कर भगवान के सामने स्वयं को समर्पित कर देता है और यह भाव रखता है कि “हे प्रभु, मैं आपका हूँ,” तब भगवान की कृपा उस पर स्वतः बरसने लगती है। उनके अनुसार शरणागति का अर्थ केवल शब्दों में समर्पण नहीं, बल्कि मन और कर्म से भी भगवान को स्वीकार करना है।
प्रेमानंद जी महाराज ने निष्कपट और पवित्र आचरण पर भी विशेष बल दिया। उन्होंने कहा कि हृदय में कपट, द्वेष या अहंकार रखने वाला व्यक्ति सच्ची भक्ति का अनुभव नहीं कर सकता। उन्होंने लोगों को दया, करुणा और सादगी का जीवन अपनाने की प्रेरणा दी और कहा कि पवित्र आचरण से भगवान शीघ्र प्रसन्न होते हैं।
महाराज जी ने अनन्य प्रेम को भक्ति का सर्वोच्च रूप बताते हुए कहा कि भगवान से किसी सांसारिक वस्तु की मांग करने के बजाय केवल प्रेम करना चाहिए। उन्होंने कहा कि जब भक्त का प्रेम निष्काम और सच्चा होता है, तब भगवान स्वयं उसके जीवन का मार्गदर्शन करने लगते हैं।
प्रवचन के दौरान उन्होंने यह भी कहा कि समर्पण का अर्थ अपनी बुद्धि और सोच को भगवान के चरणों में अर्पित कर देना है। जब मनुष्य अपने कर्मों का फल भगवान पर छोड़ देता है और केवल कर्तव्य का पालन करता है, तब उसका जीवन शांत और संतुलित हो जाता है।
अंत में महाराज जी ने कहा कि जब भक्त पूरी तरह से कृष्ण के हो जाते हैं, तब उनका मन और चित्त भी कृष्णमय हो जाता है। यही अवस्था सच्ची प्रभु प्राप्ति की होती है, जिसमें व्यक्ति को भीतर से आनंद और शांति का अनुभव होने लगता है।
उनके इस संदेश को सुनने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे और सभी ने भक्ति मार्ग पर चलने का संकल्प लिया। महाराज जी ने लोगों से आग्रह किया कि वे जीवन में भक्ति, सादगी और सदाचार को अपनाएं, क्योंकि यही जीवन को सार्थक बनाने का वास्तविक मार्ग है।
श्रीकृष्ण प्राप्ति के मुख्य उपाय
- निरंतर नाम जप
वाणी से निरंतर ‘राधा-राधा’ या ‘श्रीकृष्ण’ नाम का जप करना चाहिए। महाराज जी के अनुसार नाम में अपार शक्ति होती है, जो मन को शुद्ध और शांत करती है। - पूर्ण शरणागति (Surrender)
भगवान के सामने अहंकार त्यागकर स्वयं को समर्पित कर देना चाहिए और भाव रखना चाहिए—“हे प्रभु, मैं आपका हूँ।” यह सबसे सरल और शीघ्र फल देने वाला मार्ग है। - निष्कपट और पवित्र आचरण
हृदय में कपट या द्वेष न रखें। पवित्र आचरण, दया और करुणा का भाव रखने से भगवान शीघ्र प्रसन्न होते हैं। - अनन्य प्रेम
भगवान से सांसारिक वस्तुओं की अपेक्षा न रखें, बल्कि केवल उनसे प्रेम करें। निस्वार्थ प्रेम ही भक्ति का सर्वोच्च स्वरूप है। - पूर्ण समर्पण
अपनी बुद्धि, विचार और कर्म को भगवान के चरणों में समर्पित कर देने से जीवन में आध्यात्मिक शांति और प्रभु कृपा का अनुभव होता है।
महाराज जी कहते हैं कि जब भक्त पूरी तरह से कृष्ण के हो जाते हैं, तब उनका मन और चित्त भी कृष्णमय हो जाता है, और यही सच्ची प्रभु प्राप्ति है।