Premanand Maharaj Pravachan: एकांत वार्तालाप एवं दर्शन कार्यक्रम के दौरान श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज ने भक्ति, जीवन और मन की प्रवृत्तियों पर गहन प्रकाश डाला। महाराज जी ने कहा कि मनुष्य के दुखों का सबसे बड़ा कारण उसका चंचल मन है। जब तक मन नियंत्रित नहीं होता, तब तक न भक्ति स्थिर होती है और न ही जीवन में शांति आती है।
महाराज जी ने समझाया कि मन को जीतने का पहला उपाय है—उसे सही दिशा देना। मन स्वभाव से भोग और विकारों की ओर भागता है, लेकिन यदि उसे निरंतर भगवान के नाम-स्मरण और सत्संग में लगाया जाए, तो वही मन साधना का सबसे बड़ा साधन बन जाता है।
उन्होंने कहा कि मन को दबाने से नहीं, समझाने और अभ्यास से जीता जाता है। रोज़-रोज़ नाम जप, संयमित दिनचर्या और विकारों से दूरी मन को शुद्ध करती है। जैसे-जैसे मन शुद्ध होता है, वैसे-वैसे व्यक्ति के विचार और कर्म भी बदलने लगते हैं।
महाराज जी ने यह भी कहा कि मन का असंतुलन ही क्रोध, चिंता और भय को जन्म देता है। लेकिन जब मन प्रभु पर भरोसा करना सीख लेता है, तो कठिन परिस्थितियाँ भी साधक को विचलित नहीं कर पातीं। यही मन पर सच्ची विजय है।
अपने उपदेश के अंत में उन्होंने बताया कि सच्ची भक्ति दिखावे से नहीं, बल्कि भीतर के परिवर्तन से प्रकट होती है। जब मन अहंकार छोड़कर विनम्रता और सेवा भाव अपनाता है, तभी जीवन में वास्तविक आनंद और शांति का अनुभव होता है।
महाराज जी का यह संदेश आज के तनावग्रस्त जीवन में यह सिखाता है कि
मन पर नियंत्रण ही आत्मकल्याण का मार्ग है और नाम-स्मरण ही उसका सबसे सरल उपाय।