Haryana Punjab High court: हाईकोर्ट की HSHRC को फटकार, कैथल जिले के चावल मिल मालिकों की बड़ी राहत

कैथल जिले के चावल मिल मालिकों की बड़ी राहत प्रतिकात्मक तस्वीर..

Haryana Punjab High court: पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने हरियाणा राज्य मानवाधिकार आयोग (HSHRC) को उसकी सीमाओं की याद दिलाते हुए स्पष्ट कर दिया कि आयोग सीधे आदेश या दिशा-निर्देश जारी नहीं कर सकता। कोर्ट ने कहा कि HSHRC केवल शिकायतों की जांच करके सरकार को सिफारिशें भेजने वाला अनुशंसात्मक निकाय है।

यह टिप्पणी जस्टिस शील नागू और जस्टिस संजीव बेरी की खंडपीठ ने कैथल जिले के चावल मिल मालिकों की याचिका पर सुनवाई के दौरान की। हाईकोर्ट ने चावल मिल मालिकों को बड़ी राहत देते हुए मानवाधिकार आयोग द्वारा प्रदूषण के आधार पर जारी किए गए अंतरिम आदेशों पर रोक लगा दी।

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आयोग अदालत की तरह आदेश नहीं जारी कर सकता

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मानवाधिकार आयोग किसी भी पक्ष को सीधे निर्देश जारी नहीं कर सकता। खंडपीठ ने कहा कि आयोग का अधिकार केवल सिफारिश तक सीमित है। इन सिफारिशों को स्वीकार करना या न करना राज्य सरकार के विवेक पर निर्भर है।

याचिकाकर्ताओं के वकील विकास चतरथ ने कोर्ट को बताया कि HSHRC ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर निरीक्षण, रिपोर्ट तलब करने और पालन के निर्देश जारी किए, जबकि कानून इसे अनुमति नहीं देता।

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पर्यावरण विवाद को मानवाधिकार मुद्दा नहीं बनाया जा सकता

याचिकाकर्ताओं ने कहा कि शिकायत मूलतः पर्यावरण प्रदूषण से संबंधित थी। ऐसे मामलों के लिए पहले से ही जल अधिनियम, वायु अधिनियम और पर्यावरण संरक्षण अधिनियम मौजूद हैं। ऐसे मामलों को मानवाधिकार आयोग के अधिकार क्षेत्र में लाना अवैध है, जब तक राज्य की निष्क्रियता से स्पष्ट मानवाधिकार उल्लंघन साबित न हो।

कोर्ट ने यह भी कहा कि महज नियामकीय या तकनीकी विवाद को मानवाधिकार का मुद्दा बताकर आयोग की प्रक्रिया के अधीन नहीं किया जा सकता। रिकॉर्ड से स्पष्ट हुआ कि आयोग ने सीधे आदेश जारी किए, जबकि कानून के तहत इसका अधिकार केवल सिफारिश तक सीमित है।

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कोर्ट ने राज्य सरकार को नोटिस जारी किया

हाईकोर्ट ने आयोग को याद दिलाया कि वह कोई अदालत नहीं है और सीधे आदेश जारी करने का अधिकार नहीं रखता। खंडपीठ ने राज्य सरकार को नोटिस जारी किया और HSHRC के सभी अंतरिम आदेशों पर रोक लगा दी, अगली सुनवाई के लिए 17 मार्च 2026 की तारीख तय की गई।


निष्कर्ष

इस फैसले से यह स्पष्ट हो गया है कि HSHRC केवल सिफारिशी निकाय है, और किसी भी मामले में सीधे कार्रवाई करने का अधिकार नहीं रखता। यह फैसला राज्य के मानवाधिकार आयोग की शक्तियों की सीमाओं को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल माना जा रहा है।

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