CBI Case Hooda: पंचकूला में एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड (AJL) को प्लॉट आवंटन मामले में हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री Bhupinder Singh Hooda को बड़ी राहत मिली है। Punjab and Haryana High Court ने सीबीआई की स्पेशल कोर्ट द्वारा आरोप तय किए जाने के आदेश को रद्द कर दिया है। अदालत ने कहा कि प्रथम दृष्टया पर्याप्त आधार न होने पर आपराधिक मुकदमे को जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग माना जाएगा।
यह फैसला हरियाणा की राजनीति और लंबे समय से चल रहे इस विवादित केस के लिहाज से अहम माना जा रहा है। कोर्ट के इस आदेश के बाद फिलहाल हुड्डा और अन्य सह-आरोपियों को राहत मिल गई है।
क्या है पूरा मामला?
यह केस पंचकूला के सेक्टर-6 में लगभग 3,360 वर्ग मीटर के सरकारी भूखंड के आवंटन से जुड़ा है। यह जमीन प्रकाशन समूह Associated Journals Limited (AJL) को दी गई थी। आरोप था कि इस प्लॉट का बाजार मूल्य करीब 64.93 करोड़ रुपये था, लेकिन इसे लगभग 69 लाख 39 हजार रुपये में आवंटित किया गया।
सीबीआई ने इस मामले में हुड्डा के साथ हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण (तत्कालीन HUDA, अब HSVP) के चार वरिष्ठ अधिकारियों को भी आरोपी बनाया था। आरोप था कि भूखंड के पुनः आवंटन में नियमों की अनदेखी की गई और सरकारी खजाने को नुकसान पहुंचाया गया।
हाईकोर्ट का क्या कहना है?
जस्टिस त्रिभुवन दहिया की एकल पीठ ने अपने फैसले में कहा कि आरोप तय करने से पहले यह देखना जरूरी है कि क्या अभियोजन के पास पर्याप्त साक्ष्य हैं। कोर्ट ने पाया कि प्रथम दृष्टया आरोप सिद्ध नहीं होते।
अदालत ने टिप्पणी की कि बिना पर्याप्त आधार के आपराधिक कार्यवाही को जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने स्पेशल CBI कोर्ट द्वारा पारित आरोप तय करने के आदेश को रद्द कर दिया।
इस फैसले से CBI की कार्यवाही को झटका लगा है, जबकि बचाव पक्ष ने इसे न्याय की जीत बताया है।
केस की पृष्ठभूमि और टाइमलाइन
1982 – पहली बार आवंटन:
पंचकूला में यह प्लॉट 1982 में AJL को अखबार प्रकाशित करने के उद्देश्य से आवंटित किया गया था। उस समय हरियाणा में कांग्रेस सरकार थी और भजनलाल मुख्यमंत्री थे।
1992 – प्लॉट रिज्यूम:
सरकार ने 1992 में यह कहते हुए जमीन वापस ले ली कि निर्धारित समय सीमा में निर्माण कार्य शुरू नहीं हुआ। AJL ने इस फैसले को चुनौती दी।
2005 – दोबारा आवंटन:
2005 में कांग्रेस सरकार की वापसी के बाद, जब हुड्डा मुख्यमंत्री बने, तो यह प्लॉट दोबारा AJL को आवंटित कर दिया गया। इसी पुनः आवंटन को लेकर विवाद खड़ा हुआ।
2016 – विजिलेंस FIR:
भाजपा सरकार के कार्यकाल में 5 मई 2016 को हरियाणा विजिलेंस ब्यूरो ने प्राथमिकी दर्ज की।
2017 – CBI जांच:
4 अप्रैल 2017 को जांच Central Bureau of Investigation (CBI) को सौंप दी गई। CBI ने 27 जनवरी 2017 को केस दर्ज किया और 1 दिसंबर 2018 को चार्जशीट दाखिल की।
2021–2025 – स्टे:
हाईकोर्ट ने इस मामले में कई वर्षों तक सुनवाई पर रोक लगाए रखी।
अब ताजा फैसले में आरोप तय करने का आदेश रद्द कर दिया गया है।
राजनीतिक असर
यह मामला लंबे समय से हरियाणा की राजनीति का केंद्र रहा है। भाजपा सरकार के दौरान दर्ज हुई FIR और CBI जांच को लेकर कांग्रेस ने इसे राजनीतिक प्रतिशोध बताया था, जबकि भाजपा ने इसे भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई कहा।
हाईकोर्ट के ताजा फैसले के बाद कांग्रेस नेताओं ने राहत की सांस ली है। हुड्डा समर्थकों का कहना है कि अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि बिना पर्याप्त साक्ष्य के मुकदमा चलाना उचित नहीं। वहीं विपक्षी दलों का कहना है कि कानूनी प्रक्रिया अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है और आगे की कार्रवाई संभव है।
कानूनी विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, आरोप तय करने के स्तर पर अदालत यह देखती है कि क्या अभियोजन के पास इतना प्रारंभिक साक्ष्य है जिससे मामला आगे बढ़ाया जा सके। यदि प्रथम दृष्टया आधार नहीं बनता, तो अदालत आरोपों को रद्द कर सकती है।
इस फैसले का मतलब यह नहीं है कि पूरे मामले पर अंतिम मुहर लग गई है, बल्कि फिलहाल आरोप तय करने की प्रक्रिया को अमान्य माना गया है। आगे की कानूनी रणनीति पर निर्भर करेगा कि मामला किस दिशा में बढ़ता है।
आगे क्या?
हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद CBI के पास सुप्रीम कोर्ट जाने का विकल्प खुला है। यदि एजेंसी इस आदेश को चुनौती देती है, तो मामला उच्चतम न्यायालय में जा सकता है।
फिलहाल, इस फैसले से पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा और अन्य सह-आरोपियों को बड़ी राहत मिली है। हरियाणा की राजनीतिक सरगर्मियों में यह मुद्दा आने वाले समय में भी चर्चा का विषय बना रह सकता है।
पंचकूला AJL प्लॉट आवंटन मामला वर्षों से कानूनी और राजनीतिक बहस का विषय रहा है। हाईकोर्ट के ताजा फैसले ने इस केस को नया मोड़ दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि आपराधिक मुकदमे को आगे बढ़ाने के लिए पर्याप्त आधार होना जरूरी है।
अब सबकी नजर इस बात पर है कि क्या CBI इस फैसले को चुनौती देती है या मामला यहीं थमता है।
हरियाणा की राजनीति और कानूनी परिदृश्य में यह फैसला एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है।
