Dukh Kaun Deta Hai: अक्सर हमारे मन में यह प्रश्न आता है कि हमारे जीवन के सुख और दुख का कारण क्या है। सामान्यतः हम मान लेते हैं कि लोग जैसा व्यवहार करते हैं, वैसा ही हमारा मन हो जाता है। कोई हमारे साथ अच्छा व्यवहार करे तो हम प्रसन्न हो जाते हैं, और कोई प्रतिकूल व्यवहार करे तो हम दुखी हो जाते हैं।
लेकिन संतों का दृष्टिकोण इससे अलग है। वे बताते हैं कि अपने सुख-दुख को दूसरों के व्यवहार पर निर्भर करना अज्ञानता है। यदि हमारा मन हर व्यक्ति के व्यवहार से बदलता रहेगा, तो हमारे जीवन में स्थिरता कभी नहीं आ सकती।
संसार का स्वभाव
संसार का स्वभाव ही ऐसा है कि यहाँ हमेशा अनुकूलता नहीं मिलती।
चाहे जितना परोपकार कर लें, परिणाम में आलोचना या दुख भी मिल सकता है।
कई बार ऐसा होता है कि हम किसी का हित करते हैं, फिर भी बदले में कठोर शब्द सुनने पड़ते हैं।
इसलिए यदि हम लोगों के दिए हुए सुख-दुख से ही प्रभावित होते रहेंगे, तो जीवन में शांति मिलना कठिन हो जाएगा।
सच्चा सहारा क्या है
संतजन कहते हैं कि मनुष्य को अपने सुख-दुख का आधार लोगों को नहीं, बल्कि परमात्मा को बनाना चाहिए।
जब मन परमात्मा के चिंतन में लगा रहता है, तो दुख सहने की शक्ति भी मिलती है और सुख में भी अहंकार नहीं आता।
यही आंतरिक शांति का मार्ग है—बाहरी परिस्थितियों से ऊपर उठकर भीतर स्थिर होना।
संतों का जीवन भी यही सिखाता है
इतिहास और संतों के जीवन को देखें तो पता चलता है कि उन्हें भी जीवन में अनेक कष्ट और प्रतिकूल परिस्थितियाँ मिलीं।
परोपकार करने पर भी उन्हें हमेशा सम्मान नहीं मिला, फिर भी उन्होंने अपना विश्वास और समर्पण नहीं छोड़ा।
इससे यह सीख मिलती है कि वास्तविक शक्ति बाहरी परिस्थितियों से नहीं, भीतर के समर्पण से आती है।
प्रभु प्राप्ति का मुख्य मार्ग – समर्पण
अक्सर लोग पूछते हैं कि प्रभु कब मिलते हैं—तप से, जप से या समय के साथ?
संतों का उत्तर है कि सबसे मुख्य बात समर्पण है।
जब तक मन में देहाभिमान और अन्य आसक्तियाँ बनी रहती हैं, तब तक सच्चा अनुभव कठिन होता है।
यदि मन केवल प्रभु के प्रेम में स्थिर हो जाए और अन्य सहारों को छोड़ दे, तो आध्यात्मिक अनुभव का मार्ग सरल हो जाता है।
जीवन में हमें ऐसा बनना चाहिए कि
हम लोगों के व्यवहार से नहीं,
परमात्मा के चिंतन से सुखी रहें
और उसी से शक्ति लेकर दुख को सह सकें।
यही स्थायी शांति और संतुलन का मार्ग है।
