Aaj Ki Kahani: बापौड़ा गाँव में होली का उत्सव पूरे उत्साह से मनाया जा रहा था। चारों ओर गुलाल उड़ रहा था, ढोल की थाप पर बच्चे नाच रहे थे और गलियाँ रंगों से सराबोर थीं। उसी गाँव में दो पड़ोसी रहते थे—रमेश और सुरेश। दोनों परिवारों के बीच कई वर्षों से किसी छोटी-सी बात को लेकर मनमुटाव चला आ रहा था।
हर साल होली आती, लोग एक-दूसरे को रंग लगाते, गले मिलते; लेकिन रमेश और सुरेश अपने-अपने दरवाजे बंद कर लेते। उनके बच्चे भी इस कटुता के कारण साथ नहीं खेल पाते थे।
इस बार गाँव के बुजुर्ग हरिदास जी ने सोचा कि इस दूरी को खत्म करना चाहिए। वे सुबह-सुबह दोनों घरों में गए और बोले,
“बेटा, होली केवल रंगों से खेलने का नाम नहीं है। यह मन के मैल को धोने का पर्व है। यदि मन में कड़वाहट रहे तो रंग भी फीके लगते हैं।”
रमेश और सुरेश दोनों चुप रहे। तभी बाहर बच्चों की टोली आई और जोर से बोली,
“चाचा, आज तो सबको रंगना है!”
बच्चों की मासूम आवाज सुनकर दोनों के मन पिघल गए।
सुरेश धीरे-धीरे बाहर आया और उसने मुट्ठी भर गुलाल रमेश की ओर बढ़ा दिया। कुछ क्षण के लिए सन्नाटा छा गया। फिर रमेश मुस्कराया और उसने भी सुरेश के चेहरे पर रंग लगा दिया।
देखते ही देखते दोनों गले मिल गए।
गाँव में ढोल की आवाज और तेज हो गई। लोगों ने तालियाँ बजाईं। वर्षों की दूरी एक पल में खत्म हो गई। दोनों परिवारों ने साथ बैठकर गुजिया खाई, हँसी-मजाक किया और बच्चों ने पहली बार मिलकर रंगों की बारिश की।
उस दिन रमेश ने कहा,
“सच्ची होली तो आज खेली है। रंग तो हर साल लगते थे, पर आज मन भी रंग गया।”
हरिदास जी मुस्कराए और बोले,
“जब दिल का रंग साफ हो जाए, तभी जीवन में सच्ची खुशियाँ आती हैं।”
शिक्षा:
होली केवल बाहरी रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि दिलों को जोड़ने और मन की कड़वाहट मिटाने का अवसर है। जब हम अहंकार छोड़कर प्रेम और क्षमा का रंग अपनाते हैं, तभी जीवन सच में रंगीन बनता है। 🌈
सदैव प्रसन्न रहिए — जो प्राप्त है, पर्याप्त है।
जिसका मन मस्त है — उसके पास समस्त है।।
