Aaj Ki Kahani: आख़िरी सीढ़ी पर हार मानता रहा… फिर जो हुआ, उसने सबको चौंका दिया! एक सच्ची प्रेरक कहानी!

haar ki kahani

Aaj Ki Kahani: एक छोटे से कस्बे में अर्जुन नाम का लड़का रहता था। उसके पिता एक साधारण दर्जी थे और माँ घरों में काम करती थीं। अर्जुन पढ़ाई में ठीक था, पर उसमें एक बड़ी कमी थी — वह जल्दी हार मान लेता था।

जब भी कोई काम कठिन लगता, वह कह देता, “ये मेरे बस का नहीं।”
दो बार विज्ञान प्रदर्शनी में असफल हुआ तो उसने विज्ञान से ही दूरी बना ली। खेल प्रतियोगिता में हार गया तो खेल छोड़ दिया।

एक दिन विद्यालय में पहाड़ चढ़ाई शिविर की घोषणा हुई। अर्जुन ने नाम तो लिखवा दिया, पर मन में डर था — “मैं नहीं कर पाऊँगा।”

शिविर के दिन सभी बच्चे पास के पहाड़ पर पहुँचे। शुरुआत में सब उत्साह से चढ़ने लगे। अर्जुन भी चल रहा था, पर आधी चढ़ाई के बाद उसकी साँस फूलने लगी। रास्ता कठिन था, पैर फिसल रहे थे।

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वह बैठ गया और बोला, “सर, मैं यहीं तक ठीक हूँ। मुझसे आगे नहीं होगा।”

शिक्षक, जो अनुभवी और शांत स्वभाव के थे, उसके पास आए। उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस अर्जुन को उठाकर थोड़ी दूर ले गए और सामने इशारा किया।

अर्जुन ने देखा — शिखर बस कुछ ही दूरी पर था।
वह चौंक गया।

शिक्षक ने कहा,
“अर्जुन, तुम हमेशा आख़िरी सीढ़ी से पहले हार मान लेते हो। तुम्हें लगता है कि रास्ता खत्म नहीं होगा, जबकि मंज़िल बस एक कदम दूर होती है।”

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अर्जुन चुप था।

शिक्षक ने आगे कहा,
“जीवन पहाड़ जैसा है। कठिनाई साँसें जरूर चढ़ा देती है, पर हार मान लेना असली थकान है। जो एक कदम और बढ़ाता है, वही शिखर देखता है।”

इन शब्दों ने अर्जुन के भीतर कुछ बदल दिया। उसने गहरी साँस ली और धीरे-धीरे कदम बढ़ाने लगा। हर कदम भारी था, पर वह रुका नहीं। कुछ ही मिनटों में वह शिखर पर था।

ऊपर से नीचे का दृश्य अद्भुत था। हवा ठंडी थी, आकाश साफ था। अर्जुन के चेहरे पर संतोष था। उसने महसूस किया — अगर वह थोड़ी देर पहले हार मान लेता, तो यह दृश्य कभी न देख पाता।

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उस दिन के बाद अर्जुन ने एक नियम बना लिया —
“जब भी मन हार माने, मैं एक कदम और बढ़ाऊँगा।”

धीरे-धीरे उसका स्वभाव बदलने लगा।
विज्ञान की पढ़ाई फिर शुरू की। अभ्यास बढ़ाया।
अगले वर्ष वही अर्जुन विज्ञान प्रदर्शनी में प्रथम आया।
खेल में भी चयन हुआ।

जब किसी ने उसकी सफलता का रहस्य पूछा, तो वह मुस्कुराकर बोला,
“मैं बस आख़िरी सीढ़ी तक रुकता नहीं हूँ।”


शिक्षा:

  • हार अक्सर मंज़िल से कुछ कदम पहले मिलती है।
  • थकान असली नहीं होती, हार मानना असली होता है।
  • जो व्यक्ति एक कदम और बढ़ा देता है, वही शिखर तक पहुँचता है।

याद रखिए —
कभी-कभी सफलता और असफलता के बीच बस एक अतिरिक्त प्रयास का अंतर होता है।

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