Aaj Ki Kahani: गर्मी की हल्की-हल्की दोपहर थी। आसमान में बादलों की पतली चादर फैली हुई थी और ठंडी हवा बाग के पेड़ों को धीरे-धीरे हिला रही थी। गांव के पास बने उस पुराने बाग में बच्चों की चहल-पहल अक्सर लगी रहती थी।
उस दिन भी दो मित्र — आरव और मोहन — स्कूल से लौटकर सीधे बाग की ओर निकल पड़े। बस्ता एक तरफ रखा, जूते उतारे और खेल में मग्न हो गए। कभी पकड़म-पकड़ाई, कभी पत्थर से निशाना लगाने का खेल — दोनों की हँसी पूरे बाग में गूंज रही थी।
खेलते-खेलते अचानक उनकी नजर एक ऊँचे जामुन के पेड़ पर पड़ी।
पेड़ की डालियों पर काले, पके, चमकते जामुन गुच्छों में लटक रहे थे। धूप की हल्की किरणें उन पर पड़ रही थीं, जिससे वे और भी आकर्षक लग रहे थे।
दोनों के मुँह में पानी आ गया।
🍇 लालच या स्वाभाविक इच्छा?
मोहन ने गर्दन उठाकर कहा,
“वाह! कितने पके हुए जामुन हैं। अगर मिल जाएं तो मज़ा आ जाए।”
आरव ने पत्थर उठाकर निशाना लगाने की कोशिश की, लेकिन पेड़ इतना ऊँचा था कि पत्थर डाल तक पहुँच ही नहीं पा रहा था।
दोनों ने एक-दूसरे की ओर देखा।
समस्या सामने थी — जामुन ऊँचे थे, और वे नीचे।
मोहन थोड़ा चिढ़कर बोला,
“यार, कभी-कभी लगता है प्रकृति भी अजीब है। इतने छोटे-से फल को इतने बड़े और ऊँचे पेड़ पर क्यों उगाया? और बड़े-बड़े खरबूजे तो जमीन पर बेल में लगे रहते हैं!”
आरव ने हामी भरी,
“सही कह रहे हो। अगर अनुपात देखा जाए तो छोटे फल नीचे और बड़े ऊपर होने चाहिए थे। तब कितना आसान होता!”
दोनों को लगा कि वे बहुत तर्कसंगत बात कर रहे हैं।
🤔 प्रकृति पर सवाल
मोहन ने थोड़ी गंभीरता से कहा,
“शायद प्रकृति भी परफेक्ट नहीं है। देखो न, अगर जामुन नीचे होते तो कितनी आसानी से मिल जाते।”
आरव ने भी सहमति जताई,
“हाँ, कई बार लगता है चीजें हमारे हिसाब से नहीं बनीं।”
उनके मन में हल्का-सा असंतोष था। उन्हें लग रहा था कि दुनिया उनकी सुविधा के अनुसार क्यों नहीं बनी?
उसी समय हवा का एक झोंका आया। पेड़ की डालियां हिलीं।
🌧️ अचानक घटी घटना
अचानक ऊपर से “टप्!” की आवाज हुई।
जामुन का एक बड़ा गुच्छा टूटकर सीधे मोहन के सिर पर आ गिरा।
मोहन चौंक गया। उसके सिर पर हल्की-सी चोट लगी, पर दर्द बहुत मामूली था। कुछ जामुन नीचे बिखर गए।
आरव पहले तो घबराया, फिर हँसते हुए बोला,
“अरे! प्रकृति ने तुम्हारी शिकायत सुन ली शायद!”
मोहन ने सिर सहलाया, फिर ऊपर देखा। कुछ पल के लिए दोनों चुप हो गए।
💡 सोच का बदलता नजरिया
आरव धीरे से बोला,
“जरा सोचो, अगर ये जामुन नहीं, तरबूज होता तो?”
मोहन ने कल्पना की — एक बड़ा, भारी तरबूज ऊपर से गिरता…
वह सिहर उठा।
“सच में… अगर तरबूज गिरता तो मेरा सिर फट जाता। शायद मैं गंभीर रूप से घायल हो जाता।”
दोनों कुछ देर तक शांत रहे।
मोहन ने गहरी सांस ली और कहा,
“शायद प्रकृति ने सब कुछ सोच-समझकर बनाया है। छोटा फल ऊँचाई पर इसलिए है क्योंकि वह हल्का है। अगर बड़े फल ऊँचाई पर होते तो खतरा होता।”
आरव मुस्कुराया,
“हमने बिना समझे ही उसे गलत ठहरा दिया।”
🌎 प्रकृति का गहरा संतुलन
उस दिन दोनों ने पहली बार महसूस किया कि प्रकृति का हर निर्णय संतुलन से भरा है।
पेड़ ऊँचे होते हैं ताकि छाया दे सकें।
फल हल्के होते हैं ताकि गिरें तो नुकसान न हो।
नदियाँ नीचे की ओर बहती हैं ताकि जीवन को सींच सकें।
हर चीज का अपना स्थान और उद्देश्य है।
मोहन बोला,
“हम अक्सर जो नहीं मिलता, उसी पर ध्यान देते हैं। जो मिला है, उसकी कद्र नहीं करते।”
आरव ने हामी भरी,
“आज समझ आया — प्रकृति अन्याय नहीं करती, हम अधूरी समझ से निर्णय कर लेते हैं।”
🌟 जीवन की बड़ी सीख
दोनों ने जमीन पर गिरे जामुन उठाए।
वे हँसते हुए उन्हें खाने लगे।
अब वे शिकायत नहीं कर रहे थे।
उनके चेहरे पर संतोष था।
घर लौटते समय मोहन ने कहा,
“आज से मैं बिना सोचे शिकायत नहीं करूंगा। पहले समझने की कोशिश करूंगा।”
आरव ने मुस्कुराकर कहा,
“और जो है, उसी में खुश रहना सीखूंगा।”
📖 कहानी का संदेश
जीवन में हम अक्सर परिस्थितियों से असंतुष्ट हो जाते हैं।
हमें लगता है कि चीजें हमारे अनुसार क्यों नहीं हैं।
लेकिन जब गहराई से सोचते हैं, तो पता चलता है —
हर घटना, हर व्यवस्था, हर परिस्थिति के पीछे कोई न कोई कारण छिपा होता है।
प्रकृति का संतुलन अद्भुत है।
हमारी सीमित दृष्टि उसे समझ नहीं पाती।
🌸 अंतिम विचार
- जो मिला है, वही पर्याप्त है।
- जो नहीं मिला, शायद उसकी आवश्यकता नहीं थी।
- हर घटना में कोई न कोई भलाई छिपी होती है।
सदैव प्रसन्न रहिए — जो प्राप्त है, पर्याप्त है।
जिसका मन मस्त है — उसके पास समस्त है।
