Aaj Ki Kahani: गाँव भैरवपुर में एक साधारण परिवार रहता था। उसी परिवार का बेटा अभिषेक पढ़ाई में ठीक-ठाक था, लेकिन आत्मविश्वास की कमी के कारण हर प्रतियोगिता से दूर भागता था। उसे हमेशा लगता था कि वह दूसरों जितना अच्छा नहीं है।
एक दिन गाँव में भयंकर आँधी-तूफ़ान आया। बिजली चली गई और चारों ओर घना अंधेरा छा गया। घर के सभी लोग घबरा गए। तभी अभिषेक की दादी ने एक छोटा-सा मिट्टी का दीपक जलाया। हवा बहुत तेज़ थी, लेकिन दादी ने अपने दोनों हाथों से दीपक को ढक लिया।
अभिषेक ने पूछा,
“दादी, इतनी तेज़ हवा में यह छोटा-सा दीपक क्या कर पाएगा?”
दादी मुस्कुराईं और बोलीं,
“बेटा, अंधेरे को मिटाने के लिए सूरज नहीं, एक दीपक भी काफी होता है… बस उसे बुझने मत दो।”
तूफ़ान और तेज़ हो गया। खिड़कियाँ हिलने लगीं, दरवाज़े काँपने लगे, पर दीपक जलता रहा। दादी ने कहा,
“हवा अपना काम कर रही है और दीपक अपना। अगर दीपक यह सोचकर बुझ जाए कि हवा बहुत तेज़ है, तो घर पूरी तरह अंधेरा हो जाएगा।”
अभिषेक के मन में जैसे कोई नई रोशनी जल उठी। उसे समझ आया कि जीवन में कठिन परिस्थितियाँ आती रहेंगी, लेकिन अगर मन का दीपक — यानी आत्मविश्वास — जलता रहे, तो रास्ता हमेशा दिखाई देता रहेगा।
अगले दिन स्कूल में भाषण प्रतियोगिता थी। पहले वह डर के कारण भाग लेने से मना कर चुका था, लेकिन इस बार उसने नाम लिखवा दिया। मंच पर जाते समय उसके हाथ काँप रहे थे, मगर उसे दादी का दीपक याद आया। उसने मन ही मन कहा,
“मुझे हवा से नहीं, अपने बुझने से डरना चाहिए।”
उसने पूरे आत्मविश्वास से भाषण दिया। परिणाम आया तो वह प्रथम नहीं आया, पर उसे “साहस पुरस्कार” मिला। यह पुरस्कार उसके लिए किसी भी ट्रॉफी से कम नहीं था।
धीरे-धीरे वह हर चुनौती को स्वीकार करने लगा। कुछ वर्षों बाद वही अभिषेक एक सफल अधिकारी बना। जब भी जीवन में कठिन समय आता, वह दादी के उस छोटे से दीपक को याद करता।
शिक्षा
परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी विपरीत हों, यदि आत्मविश्वास का दीपक जलता रहे तो सफलता का मार्ग अवश्य प्रकाशित होता है।
सदैव प्रसन्न रहिए — जो प्राप्त है, पर्याप्त है।
जिसका मन मस्त है — उसके पास समस्त है।
