Aaj Ka Kahani: एक छोटे से कस्बे में रामेश्वर दत्त नाम का एक बालक रहता था। बचपन में ही उसके पिता का देहांत हो गया था। घर की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर थी। उसकी माँ सावित्री देवी थोड़ी-बहुत पढ़ी-लिखी थीं, पर इतनी शिक्षा से अच्छी नौकरी मिलना संभव नहीं था। फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी।
वह घर-घर बर्तन माँजतीं, कपड़े सिलतीं और रात-रात भर मेहनत करतीं, ताकि अपने बेटे की पढ़ाई में कोई कमी न रहे। उनका सपना था—“मेरा बेटा पढ़-लिखकर बड़ा आदमी बने।”
रामेश्वर दत्त स्वभाव से शांत और संकोची था। वह कम बोलता, लेकिन किताबों में खोया रहता। एक दिन वह स्कूल से लौटा तो उसके हाथ में एक लिफाफा था। उसने माँ से कहा,
“माँ, गुरुजी ने यह चिट्ठी आपके लिए भेजी है। ज़रा पढ़कर बताइए इसमें क्या लिखा है?”
सावित्री देवी ने चिट्ठी पढ़ी। कुछ क्षणों के लिए उनकी आँखें नम हो गईं। लेकिन अगले ही पल उन्होंने मुस्कुराते हुए बेटे से कहा—
“बेटा, इसमें लिखा है कि तुम बहुत होशियार हो। इस स्कूल में तुम्हें पढ़ाने लायक शिक्षक नहीं हैं। तुम्हें किसी बड़े विद्यालय में भेजना चाहिए।”
यह सुनते ही रामेश्वर दत्त के भीतर आत्मविश्वास की एक नई लौ जल उठी। उसने खुद को विशेष समझना शुरू किया। माँ ने उसका दाखिला दूसरे विद्यालय में करा दिया।
समय बीतता गया। रामेश्वर दत्त ने कठिन परिश्रम, अनुशासन और माँ के अटूट विश्वास के सहारे पढ़ाई जारी रखी। चुनौतियाँ आईं, असफलताएँ भी मिलीं, लेकिन हर बार उसे माँ के शब्द याद आते—“तुम बहुत होशियार हो।”
वर्षों की मेहनत रंग लाई। उसने सिविल सेवा परीक्षा उत्तीर्ण की और एक सम्मानित आईएएस अधिकारी बन गया। पूरा कस्बा उसकी सफलता पर गर्व करने लगा।
अब सावित्री देवी वृद्ध हो चुकी थीं। एक दिन लंबी बीमारी के बाद उनका देहांत हो गया। माँ के जाने से रामेश्वर दत्त भीतर से टूट गया। रोते-रोते उसने उनकी पुरानी अलमारी खोली। उसमें उसके बचपन के खिलौने, कपड़े और कई पुरानी यादें सहेज कर रखी थीं।
तभी उसे वही पुरानी चिट्ठी मिली। काँपते हाथों से उसने उसे पढ़ा—
“आदरणीय अभिभावक,
आपका पुत्र पढ़ाई में अत्यंत कमजोर है। उसकी बुद्धि उम्र के अनुसार विकसित नहीं है। हम उसे अपने विद्यालय में पढ़ाने में असमर्थ हैं…”
यह पढ़ते ही रामेश्वर दत्त फूट-फूटकर रो पड़ा। आज वह जो कुछ भी था—अपनी माँ के विश्वास और प्रोत्साहन के कारण था।
उसे समझ आ गया कि माँ ने सच नहीं, बल्कि उसके भविष्य को बचाने वाला साहस पढ़कर सुनाया था। उन्होंने बेटे की कमजोरी नहीं देखी, उसकी संभावना देखी।
उस दिन रामेश्वर दत्त ने महसूस किया—
माँ केवल जन्म नहीं देती, वह अपने विश्वास से भविष्य गढ़ती है।
